“मेरे हिस्से की खुशी” पुस्तक के लेखक अभिषेक सिंह के साथ साक्षात्कार

इस विशेष साक्षात्कार में अभिषेक ने ‘मेरे हिस्से की खुशी’, जीवन के अनुभवों, सामाजिक असमानताओं और अपनी कविताओं के माध्यम से आत्ममंथन व बदलाव की सोच पर चर्चा की है।
on Oct 20, 2026
Abhishek Singh

फ्रंटलिस्ट: ‘मेरे हिस्से की खुशी’ शीर्षक के पीछे की कहानी क्या है? इस नाम तक आप कैसे पहुँचे?

अभिषेक: मेरे हिस्से की खुशी शीर्षक की कहानी करीब एक दशक पुरानी है। सोशल मीडिया पे लोगों का ज्ञान बांटने का काम अपनी चरम सीमा पर था। ज्यादातर बातें दूसरों को गलत साबित करने , उनको नीचा दिखाने और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ साबित की होड़ लगी थी।(जो आज भी बदस्तूर जारी है) इतनी ज्यादा नकारात्मकता के बीच मैंने कुछ ऐसी चीजें साझा करना शुरू किया जो एक उम्मीद जगाये, चेहरे पे मुस्कुराहट लाये और हमारा इंसानियत में विश्वास दोबारा जगाए। देश और दुनिया के कोने कोने में ऐसे अनेक असाधारण लोग हैं और ऐसी अनेक संस्थाएं है जो बिना किसी स्वार्थ के आस पास के लोगों, जीवों, पर्यावरण और हमारी पृथ्वी को एक बेहतर जगह बनाने में प्रयासरत है। उसी समुद्र में एक छोटी सी बूंद बनी ' मेरे हिस्से की खुशी '। कुछ साथियों के साथ मिलकर हमने ये मंच शुरू किया जहां हम अपने आस पास के लोगों, खास तौर पे बच्चों और महिलाओं की जिंदगी में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं।

हमारा सपना एक समावेशी समाज का है जिसमें धर्म, वर्ण, जाति, बैंक बैलेंस वाली हैसियत की कोई जगह नहीं। सब समान हैं और जिनको समान नहीं समझा जाता, उनकी मदद करके उसे सबके बराबर में खड़े होने का हक दिलवाने का प्रयास। हम सबको एक ही न्योता देते है कि आइए और बटोर लीजिए अपने हिस्से की खुशी।

जब मेरी कविताओं के संकलन को प्रकाशित करने की बात आयी तो शीर्षक ढूंढने ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। जो काम हम दिन रात करते है, जो हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है, वही किताब का शीर्षक बन गया- मेरे हिस्से की खुशी।

फ्रंटलिस्ट: आपने लिखा है कि किताबों ने कम और ज़िन्दगी ने ज्यादा सिखाया - ऐसा कौन सा जीवन-अनुभव था जिसने इस कविता संग्रह की नींव रखी?

अभिषेक: बुल्ले शाह कहते हैं - पढ़ पढ़ आलिम फाजिल होया, कदी अपने आप नू पढ़या नई।

किताबें पढ़ लिखकर हम चाहे जितनी तालीम हासिल कर लें और उसके बाद भी हमारी हरकतें जाहिलों वाली हों तो क्या फायदा। ज़िंदगी सबसे बड़ी शिक्षक है जो हमारे पैदा होने से मरने तक रोज़ कुछ न कुछ सीखने का मौका देती है। हाँ! हम सीखना चाहें या नहीं ये अलग बात है। हम अपने आप से, आस पास के लोगों से, उनके अनुभवों से, गलतियों से, सफलताओं से इतना कुछ सीख सकते है जिसकी कोई सीमा नहीं है।

जरूरत है तो सिर्फ एक अच्छा शिष्य बनने की और अपने अहंकार को तिलांजलि देने की। मेरी इस कविता संग्रह की प्रत्येक कविता उन बातों से, उन घटनाओं से प्रेरित है जो या तो मैंने स्वयं अनुभव की हैं या अपने आस पास होती महसूस की हैं।और हाँ! मेरा ज़िन्दगी से सीखना और लिखना अभी भी जारी है।

फ्रंटलिस्ट: मेरठ और लखनऊ की जन्मभूमि से बेंगलुरु की कर्मभूमि तक का सफर - इस भौगोलिक और सांस्कृतिक बदलाव ने आपकी लेखनी को किस तरह प्रभावित किया?

अभिषेक: हमारे देश की एक खासियत है कि थोड़ी थोड़ी दूरी पर, जैसे जैसे गाँव , कस्बे और शहर बदलते हैं उससे दुगनी तेज़ी से भाषा, पहनावा, संस्कृति, खान - पान बदलता जाता है। अपने जीवन में और खास तौर पर पेशे के सिलसिले में देश में कई जगह भ्रमण करने का अवसर मिला। उसी दौरान हमारे देश की इन अनेकताओं के इंद्रधनुष को करीब से देखने का मौका मिला।

चाहे वो मेरठ हो, लखनऊ या बैंगलोर, हर शहर या समुदाय में रहने वाले लोगों के रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, त्योहार और कला काफी अलग है और हमें बहुत कुछ सीखने का मौका देती है। यदि हम सीखने और आत्मसात करने के लिए तैयार है तो। वरना तो लोग इन्हीं मापदंडों को एक दूसरे से अलग करने, उनके बीच खाई पैदा करने के लिए प्रयोग करते हैं। खैर! जैसी जिसकी सोच।

फ्रंटलिस्ट: आपकी कविताओं में राजनीति को रोज़मर्रा की ज़िन्दगी, भूख और रोटी की परिभाषा से जोड़ा गया है - क्या आप किसी एक कविता का उदाहरण देकर बताएंगे कि यह जुड़ाव कैसे बना?

अभिषेक: मेरी कविताओं में राजनीति, भूख और रोटी का रिश्ता कई जगह देखने को मिलता है। मेरा मानना है कि राजनीतिज्ञ जिस दिन गरीब को इतना समर्थ बना देगा कि वो अपनी रोटी खुद कमा सके और अपने परिवार का पेट पाल सके, उस दिन उसकी दुकान बंद हो जाएगी। जब तक साधारण नागरिक उनपर निर्भर है उसका पेट बड़ा और बड़ा होता जायेगा। इसी विषय पर मेरी एक कविता ' सेठ का पेट ' एक छोटा सा उदाहरण है। इसके अतिरिक्त ' आईना ' और ' मौत के सौदागर ' भी इसी विषय पर प्रकाश डालती हैं।

फ्रंटलिस्ट: आपने ३ दशकों के विभिन्न कार्य-क्षेत्रों में काम किया है - इस विविध पेशेवर अनुभव ने आपकी काव्य-दृष्टि को कैसे आकार दिया?

अभिषेक: ३ दशकों में मैने कॉर्पोरेट जगत के काफी रंग देखे हैं। वो कर्मचारी जो बहुत शिद्दत से काम करता है पर 15 तारीख से ही परेशान हो जाता है कि कमबख़्त पगार खत्म हो गई पर ये पहाड़ जैसा महीना खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। वहीं कुछ वातानुकूलित कमरे में बैठने वाले उच्च अधिकारी इस बात से परेशान कि आज कौन सा नया व्यंजन खाया जाए या किस जगह घूम के आया जाए। बेशक, कंपनी के खर्चे पर ही।

लोगों को मौके पे चौका लगाते देखा और वहीं दूसरी तरफ अपने ईमान का सौदा न करने को तैयार लोग देखे। काम के साथ साथ आगे पढ़ाई करने वाले लोग देखे और भरी दोपहर में ' एक पैग और ' वाले भी देखे। इंसान की सूरत और उसके पीछे छिपी सीरत यदि आप पढ़ सकें तो बहुत कुछ सीख सकते हैं। बहुत कुछ जाना, सीखा और दलदल में फंसने के बजाय, उसे कागज पर उतारना ही बेहतर समझा।

फ्रंटलिस्ट: संग्रह की भूमिका में कहा गया है कि यह संवाद एकतरफा है - क्या आप पाठकों से किसी दोतरफा संवाद या प्रतिक्रिया की उम्मीद करते हैं?

अभिषेक: एक जुमला मैं अक्सर इस्तेमाल करता हूं - जैसी जिसकी सोच।

मेरा मानना है कि हर इंसान की अपनी सोच है, अपनी परिस्थितियां है और उनसे निपटने के अपने तरीके है। कोई एक पैमाना बनाकर सबको उसी तराज़ू में तौलना गलत है।

मेरा सही और तुम्हारे गलत की परिभाषा अलग अलग हो सकती है। दूसरों के अनुभवों से सीखने का अवसर सबके पास है किंतु वो अनिवार्य नहीं है।

कक्षा में अध्यापक सबको समान पढ़ाते हैं लेकिन कुछ छात्र अव्वल आते हैं और कुछ पीछे रह जाते हैं। इसका असर अध्यापक की योग्यता पर नहीं पड़ता।

हाँ! मेरी कविताओं का संवाद एकतरफा है, कही कहीं प्रत्यक्ष है। इसका उद्देश्य पाठक के मन को झझकोरने का है, आँख मूंदकर अंधेरा मानने वालों को जगाने का है। यदि पाठक ठहर कर सोचने को मजबूर हो जाए, अपने आप से संवाद करे और अपने स्वयं के विश्लेषण से अपने जीवन में कुछ बदलाव ला सके, तो मेरे लिए वही दोतरफा संवाद और प्रतिक्रिया काफी है।

फ्रंटलिस्ट: अपने गिरेबां में झांकने पर मजबूर करना’ - क्या यह आपकी कविता का सायास उद्देश्य था, या यह लेखन-प्रक्रिया के दौरान स्वाभाविक रूप से उभरा?

अभिषेक: हममे से बहुत कम लोग वाकई में बेफकूफ हैं। ज्यादा तादाद उनकी है जो जरूरत से ज्यादा समझदार हैं। हमें सही और गलत का फर्क बख़ूबी पता है। हाँ! हम वही करते हैं जो हमारे लिए अनुकूल हो। फिर वहां सच - झूठ, सही - गलत की परिभाषाएं धूमिल हो जाती हैं। लेकिन दूसरे पर उंगली उठाने का कोई मौका हम नहीं चूकते।

अपने गिरेबां में झांकने पर मजबूर करना- ये जानबूझकर हम सबको बताने के लिए है कि किसको बेवकूफ बना रहे है हम - दूसरों को, खुद को या उस ऊपरवाले को( जिसको भी आप मानते हों) ।शायद खुद के भीतर झांककर कुछ शर्म आ जाए और हमने से कुछ आदमी इंसान बन जाएं।

फ्रंटलिस्ट: आपके मंच ‘मेरे हिस्से की खुशी’ के ज़रिए समाज की खाई पाटने की जो कोशिश है, उसकी शुरुआत कैसे हुई और आगे इसे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?

अभिषेक: ‘मेरे हिस्से की खुशी’ के पीछे का विचार हर व्यक्ति के लिए खुशी की अपनी एक परिभाषा होती है। किसी के लिए यह एक कप कॉफी हो सकती है, अपनों से मिलना, बटुए में पैसे होना, अपनी पसंदीदा पोशाक पहनना, बारिश का होना, माँ का फोन आना, काम पर मिली प्रशंसा, परीक्षा में अच्छे अंक या फिर कुछ और। अब बात करते हैं एक अलग तरह की खुशी की - ‘समावेशी खुशी’ (Inclusive Happiness)। ऐसी खुशी, जिसमें बात हमेशा सिर्फ ‘मैं’ और मुझे खुश रहने के लिए क्या चाहिए तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह भी मायने रखता है कि मेरे आसपास के व्यक्ति को क्या खुश करेगा।

सड़क पर खेलता हुआ बच्चा, घर में बैठी दादी, काम के बोझ से दबा हुआ कर्मचारी, तनावपूर्ण रिश्ते, अपने अगले भोजन का इंतज़ाम करने की कोशिश करता परिवार, लगातार दवाइयाँ लेते-लेते थका हुआ कोई व्यक्ति, वह पेड़ जिसे कल काट दिया जाएगा, बेसहारा पिल्ला, बारिश और सूखे से बेहाल किसान - इन सबका और हर उस व्यक्ति व हर उस चीज़ का, जिसका हमसे कोई न कोई संबंध है, अपनी खुशी में एक हिस्सा पाने का अधिकार है।

यहीं से ‘मेरे हिस्से की खुशी’ की शुरुआत होती है। अगर इन प्रयासों में किसी की मदद के लिए अपना हाथ बढ़ाना आपको खुशी देता है, तो आप बिल्कुल सही जगह पर हैं। अगर अपना समय देकर किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना आपको अच्छा लगता है, तो आप सही जगह पर हैं। अगर आप बिना किसी बदले की उम्मीद के किसी और के लिए एक कदम आगे बढ़ने को तैयार हैं, तो समझिए आप सही जगह पहुँच चुके हैं।

यह एक ऐसा खुला मंच है, जहाँ समान सोच रखने वाले व्यक्ति और समूह साथ आ सकते हैं और उस सच्ची खुशी को तलाश सकते हैं - जो खुद के लिए भी हो और सबके साथ बाँटकर भी मिले।

आइए, मिलकर उस अनमोल और अक्सर दूर लगने वाली ‘मेरे हिस्से की खुशी’ को फिर से हासिल करें - खुशी में अपने हिस्से को।

इस विचार को कहीं ऊंचाइयां नहीं छूनी है, बस फैल जाना है हम सबके अंदर जिससे कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक खूबसूरत दुनिया छोड़ जाएं।

फ्रंटलिस्ट: ५ दशकों से ज्यादा के जीवन में आपने लोगों और माहौल को ‘चुपचाप पढ़ना और अवशोषित करना’ सीखा - इस मौन अवलोकन को शब्दों में ढालने की प्रक्रिया कैसी रही?

अभिषेक: एक छोटी सी कविता है मेरी जो आपके इस प्रश्न और उसके उत्तर पर प्रकाश डालती है। ग़म जब दिल में भर जाता है स्याही के साए में कागज पे उतर आता है। कोई उसे गजल कहता है, कोई फलसफा बताता है कोई कुछ भी कहे,मेरा ग़म गलत हो जाता है ज़हन खाली हो जाता है, और तैयार हो जाता है कुछ नए ग़म भरने के लिए।

चुपचाप पढ़ना लोगों को और परिस्थितियों को, अवशोषित करना भावनाओं को और अनगिनत अनकहे शब्दों को, ये मुझे सहज रूप से आता है। शायद ये ज्यादा संवेदनशील होने का फायदा/ नुकसान है। मेरी कविताओं में ये दृश्यमान है।

फ्रंटलिस्ट: नए और उभरते कवियों को, जो अपने आसपास की सच्चाइयों को कविता में उतारना चाहते हैं, आप क्या सलाह देंगे?

अभिषेक: मेरे तजुर्बे तेरी उम्र से कुछ साल बडे हैं शायद कुछ तो सीख लो,मत दोहराओ मेरी गलतियां।मैं स्वयं को इस लायक नहीं समझता कि आज के नए और उभरते कवियों को कुछ ज्ञान दे सकूं। एक से बढ़कर एक प्रतिभाएं रोज़ हमारे सामने आ रही हैं।हाँ, यदि आप अपने आसपास की सच्चाइयों को कविता में उतारना चाहते हैं तो निर्भय होकर लिखें। इसलिए न लिखें कि व्यवहारकुशलता से किसी को प्रभावित करना है। इसलिए न लिखें कि वायरल होना है, इस उम्मीद में न लिखें कि तख्तों ताज़ या कोई पुरस्कार मिलेगा। वो सब यही धरा रह जाएगा ।

इसलिए लिखें कि कम से कम कुछ लोग उससे कुछ सीखे, भला कर सकें अपना और दूसरों का। बदलाव ला सकें पहले खुद में फिर समाज में। यदि एक फीसदी लोग भी आपकी लिखी बातों पर अमल कर लेंगे तो आपका लिखना सार्थक हो जाएगा।

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